बिहार–
जे.पी.श्रीवास्तव की रिपोर्ट
पटना: राजनीति में कब कौन दोस्त बनेगा और कब दुश्मन कहा नहीं जा सकता। याद होगा कभी लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार एक साथ संपूर्ण क्रांति आंदोलन में कदम-से-कदम मिलाकर चलते थे। जदयू और राजद की सरकार बिहार में बनी थी तब तेजस्वी यादव उप मुख्यमंत्री हुआ करते थे।
अचानक राजनीति ने ऐसा करवट लिया कि नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव में दूरियां बढ़ती गई। पारिवारिक निकटता भी कटुता में बदलती चली गई। एक दूसरे की कमियां निकालने में ही समय बीतता चला जा रहा है। हालांकि यह बात भी सत्य है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कार्यशैली बिल्कुल अलग है। वे काम करने में विश्वास रखते हैं।
मगर राजनीति में जबतक आरोप-प्रत्यारोप नहीं हो, एक दूसरे की कमियां नहीं निकाली जाये तबतक राजनीति चमकता नहीं है। इसी को चरितार्थ करते हुए लगभग दो माह तक दिल्ली प्रवास में रहने के बाद पटना लौटते ही तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर आरोपों का पिटारा खोल दिया है नीतीश कुमार पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि कोरोना काल में सभी जनप्रतिनिधियों और प्रभारी मंत्रियों के हाथ नीतीश कुमार ने बांध कर रख दिये थे जिस कारण वे अपने-अपने जिले में जाकर लोगों की मदद नहीं कर सके।
आरोप लगाते हुए यह भी कहा है कि बिहार के 27 जिलों में पेट्रोल के दाम सौ रुपए से पार कर गया है, लेकिन नीतीश कुमार हाथ पर हाथ रखकर बैठे हुए हैं। आरोप यह भी लगा रहे हैं कि लोजपा को तोड़ने में नीतीश कुमार का हाथ है। 2005 और 2010 में भी इसे तोड़ने की कोशिश की गई थी लेकिन उस समय सफलता हाथ नहीं लगी। अपनी बात में दम भरते हुए उन्होंने ने कहा कि जब लोजपा का एक भी सांसद नहीं था तब लालू यादव ने राम विलास पासवान को राज्य सभा भेजा था। लगे हाथ उन्होंने नीतीश कुमार को नसीहत भी दे डाली कि जितना ध्यान वे दूसरी पार्टियों को तोड़ने में लगाते हैं उतना यदि बिहार के विकास में लगाते तो बेहतर होता।
हालांकि नीतीश कुमार ने एक शब्द में इसपर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि लोग अपना टीआरपी बढ़ाने के लिए मेरा नाम लेते हैं।





