खेल के करोड़ों कमाने में बालू वाले अफसरों के विरुद्ध बैठाई गई जांच सार्वजनिक किये जाने से जांच की सफलता पर संदेह

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बिहार—

जे.पी.श्रीवास्तव, बिहार

पटना:पिछले दिनों इसी चैनल पर एक समाचार प्रकाशित हुआ था जिसमें यह बताया गया था कि बिहार के दो एसपी सहित कई एसडीओ, डीएसपी, डीटीओ,एमभीआई,खनन पदाधिकारी, अंचलाधिकारी, पुलिस इंस्पेक्टर,सब इंस्पेक्टर की बालू के अवैध खनन में संलिप्तता पाई गई थी। आर्थिक अपराध इकाई ने पदाधिकारियों की संलिप्तता की गहन जांच कर रिपोर्ट सौंपी थी। इस रिपोर्ट के आधार पर सभी अधिकारियों को उनके पदस्थापित जगहों से हटा दिया गया था।
सरकार के आदेश पर आर्थिक अपराध इकाई ने बिहार के 42 वैसे अफसरों के सम्पत्ति की जांच शुरू कर दी है जिनपर बालू माफियाओं से साठ-गांठ कर करोड़ों रुपए कमाने का आरोप है। लेकिन ऐसी आशंका जताई जा रही है कि अवैध रूप से कमाइ गई सम्पत्ति को वे लोग ठिकाने लगा सकते हैं। ऐसी स्थिति में जांच का कोई मतलब नहीं रह सकता है। एक सिनियर आईपीएस ऑफिसर ने एक न्यूज नेटवर्क से कहा कि जांच चुपचाप करानी चाहिए थी। क्योंकि जांच कराये जाने की बात खुलने से वैसे लोगों को अवैध रुप से अर्जित सम्पत्ति को ठिकाने लगाने का मौका मिल जायेगा जिनके विरुद्ध जांच चलने की बात बताई जा रही है।
हालांकि आर्थिक अपराध इकाई ने बिहार के 6 जिलों में अवैध बालू खनन माफियाओं के मिली भगत से आय से अधिक संपत्ति इकठ्ठा करने वाले अफसरों के सम्पत्ति का विवरण जुटाने का कार्य प्रारंभ कर दिया है। यद्यपि सरकार ने दो आईपीएस अधिकारियों सुधीर कुमार पोरिका और राकेश कुमार दुबे सहित 42 अधिकारियों को बालू खनन माफियाओं के साथ गठजोड़ के आरोप के कारण ट्रांसफर कर दिया है।
यह तो समय बताएगा कि आर्थिक अपराध इकाई द्वारा जांच के जद में आये अधिकारियों के सम्पत्ति की जांच का क्या परिणाम होता है। उनके द्वारा आय से अधिक सम्पत्ति इकठ्ठा किये जाने का कहां तक पता चल पाता है। क्योंकि बिहार में जांच की प्रक्रिया बहुत लम्बी चलती है और सजा देने की प्रक्रिया तो और लम्बी चलती है। एकबार आय से अधिक संपत्ति जब्त करने का आदेश यदि निर्गत हो भी जाता है तो उसके बाद वैसे अधिकारी न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं। त्वरित कार्रवाई की संभावना बहुत कम होती है। यही कारण है कि कतिपय अधिकारी निडर होकर अवैध कमाई करने में लगे रहते हैं।

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