मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पुराने डील पर करना पड़ा संतोष

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बिहार—

जे.पी.श्रीवास्तव, बिहार

पटना: जदयू का कोई भी दांव काम नहीं आया। केन्द्रीय मंत्रिमंडल विस्तार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुराने फाॅर्मूले पर ही कायम रहते हुए जदयू कोटे से केवल एक सांसद को मंत्रिमंडल विस्तार में जगह दी है।
कयास लगाया जा रहा था कि कम-से-कम जदयू से चार सांसदों को मंत्रिमंडल विस्तार में जगह दी जायेगी। परन्तु हुआ वही जो इसके पूर्व के मंत्रिमंडल विस्तार में जदयू को केवल एक सीट दी जा रही थी और जदयू ने इसे वाजिब नहीं मानते हुए मंत्रिमंडल में शामिल होने से इंकार कर दिया था।
इससे यह साफ हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केन्द्र की राजनीति में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू को ज्यादा तवज्जो देना नहीं चाहते हैं। बताते चलें कि करीब दो साल पूरा होने पर मंत्रिमंडल का विस्तार किया गया है और कुल 43 मंत्रियों को शपथ दिलाई गई है। आपको याद होगा कि 2019 के मंत्रिमंडल में जदयू को एक केंद्रीय मंत्री का ऑफर दिया गया था। लेकिन जदयू के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने कहा था कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी 17 और जेडीयू 17 सीटों पर चुनाव में प्रत्याशी उतारे थे। जिनमें 16 सीटों पर जेडीयू और 17 सीटों पर बीजेपी जीत हासिल की थी। उस समय नीतीश कुमार ने मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए समान प्रतिनिधित्व की मांग की थी जिसे मानने से प्रधानमंत्री ने इन्कार कर दिया था। नतीजा यह हुआ कि जेडीयू मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हुआ। आज के मंत्रिमंडल विस्तार में जदयू को एक सीट से ही संतोष करना पड़ा है।
आखिर किस कारण से जदयू को अपने स्टैंड से पिछे हटना पड़ा है।इसे समझने के लिए 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के पन्नों को पलटना होगा। एनडीए के घटक दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा था। इसमें मुख्य भूमिका में बीजेपी और जदयू पार्टी थी। दोनों ने सहयोगी दलों के लिए अपनी-अपनी कुछ सीटें छोड़ दी थी। लेकिन लोजपा द्वारा जदयू के साथ बगावत के चलते जदयू को भारी नुक़सान हुआ था। भाजपा जहां 74 सीटों पर जीत हासिल की थी वहीं जदयू को मात्र 43 सीटों से संतोष करना पड़ा था। इसको लेकर प्रदेश के बीजेपी नेतृत्व मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बीजेपी को देखना चाहती थी। परन्तु बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के कारण मुख्यमंत्री की कुर्सी नीतीश कुमार के लिए बरकरार रह गई।
नीतीश कुमार के राजनैतिक जीवन की यह खासियत रही है कि वे हमेशा बराबरी की हिस्सेदारी पर गठबंधन करते हैं। यह सर्वविदित है कि नीतीश कुमार कभी भी गठबंधन में छोटे भाई की भूमिका में नहीं दिखे हैं। हमेशा अपना स्थान उपर रखते हैं।यह पहला मौका है जब नीतीश कुमार डील में कमजोर पड़े हैं। हालांकि इस डील में उनका प्रत्यक्ष हाथ नहीं है। डील के लिए उन्होंने पहले ही बता दिया था कि राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह इसके लिए अधिकृत हैं।