हाल ही में सरकार ने संसद को बताया कि पिछले पांच सालों में देश भर में हाथ से मैला ढोने वालों की कोई मौत नहीं हुई है। सरकार के इस बयान पर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि मरने के बाद भी लोगों की गरिमा को लूटा जा रहा है। बता दें कि मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 के तहत प्हाथ से मैला ढोने पर प्रतिबंध है।
राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने कहा है कि 66,692 मैला ढोने वालों की पहचान की गई है। हालांकि, हाथ से मैला उठाने वालों की कितनी मौतें दर्ज की गई हैं, इस पर उन्होंने जवाब दिया, “हाथ से मैला ढोने के कारण से कोई मौत नहीं हुई है।”
संसद के पिछले सत्र के दौरान, 10 मार्च को, अठावले ने कहा था, “हाथ से मैला ढोने के कारण कोई मौत नहीं हुई है। हालांकि, सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय व्यक्तियों की मौत की खबरें आई हैं।” कार्यकर्ताओं ने सरकार की इस प्रतिक्रिया को उदासीनता का पूर्ण अभाव बताया है।
मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने के लिए काम करने वाले संगठन सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन ने कहा कि मंत्री ने खुद स्वीकार किया था कि सीवर की सफाई के दौरान 340 लोगों की मौत हुई थी। लेकिन अब, वह मैनुअल मैला ढोने को सूखे शौचालयों की सफाई समझ रहे है। इसलिए, उन्हें अपने बयान में बहुत स्पष्ट रूप से उल्लेख करना चाहिए कि सूखे शौचालयों की सफाई में लोग मरते नहीं हैं, लेकिन यहां सेप्टिक टैंक में लोग मर जाते हैं। सरकार हर चीज को नकार रही है और उसी तरह वह हाथ से मैला ढोने से होने वाली मौतों से इनकार कर रहे हैं।”




