बिहार——-
पटना: कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में भी लोगों की मदद करने में अपना जीवन व्यतीत करनेवाले, विश्व स्तर पर मानवता एवं मानवीय उद्देश्यों के लिए दूसरों की मदद करने में अपनी जान तक गंवा देने को तैयार रहते हैं।ऐसे ही लोगों को रियल लाइफ हिरो की उपाधि से नवाजा जाता है और उन्हीं की याद में हर साल 19 अगस्त को पूरे विश्व में मानवतावादी दिवस मनाया जाता है। इस साल हम 12वां विश्व मानवतावादी दिवस ऐसे समय मना रहे हैं जब पूरी दुनिया कोरोनावायरस महामारी से लड़ रही है। इस कठिन समय में भी हमारे मानवतावादी (Humanitarians) जरुरतमंद लोगों की जी जान से मदद कर रहे हैं।
लगभग 63 देशों में संकट में फंसे लोगों की मदद के लिए अभूतपूर्व बाधाएं पार करके मानवतावादी कार्यकर्ता आगे आ रहे हैं और उनकी मदद कर रहे हैं। विश्व मानवतावादी दिवस पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा मनाया गया। इसके लिए वर्ष 2008 में एक प्रस्ताव A/46/L.49 पारित किया गया था। प्रस्ताव स्वीडन द्वारा प्रायोजित किया गया था। बताया जाता है कि आज से 18 साल पहले इराक़ की राजधानी बगदाद में 19 अगस्त 2003 को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पर हमला किया गया था। इस हमले में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के 22 सहकर्मी मारे गये थे। इसमें इराक में संयुक्त राष्ट्र महासभा के महासचिव के विशेष प्रतिनिधि सर्जियो विएरा डी मेलो की भी बम विस्फोट के कारण मृत्यु हो गई थी। इसके बाद से 19 अगस्त को विश्व मानवतावादी दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। संयुक्त राष्ट्र मानवीय कार्यों के प्रमुख स्टीफन ओब्रायन के अनुसार यह मानवीयता को याद करने और विश्व भरके उन हजारों मानवीय सहायता कर्मियों को श्रद्धांजलि देने का दिन है, जिन्होंने संकट और घोर निराशा के बीच ज़रुरत मंद लोगों के बीच जीवनरक्षक मदद मुहैया कराने के लिए अपनी जिंदगी जोखिम में डाली।
विश्व मानवतावादी दिवस मनाये जाने की शुरुआत भारत में वर्ष 2013 में हुई; जबकि संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इसकी शुरुआत वर्ष 2008 में की गई थी।इसके उद्देश्यों की चर्चा इसलिए आवश्यक है कि आम लोगों को इस महान कार्य की जानकारी मिल सके। इसे मनाने का उद्देश्य यह है कि जिन्होंने मानव मात्र की सेवा में अपना पूरा जीवन लगा दिया है उनको उचित सम्मान दिया जा सके। यह दिन मानवता के ऐसे सेवकों को समर्पित है जिन्होंने मानवता की सेवा करते हुए अपनी जान की भी परवाह नहीं की।
विश्व भर में फैली अशांति और संघर्ष में लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। ऐसे लोगों की संख्या 6 करोड़ से अधिक है। विस्थापित बच्चों को सशस्त्र समूहों में भर्ती किया जाता है और उन्हें लड़ाई में झोंक दिया जाता है। महिलाओं का उत्पीड़न एवं अपमान किया जाता है। ऐसे मौके पर राहत कर्मी उनकी मदद करते हैं और चिकित्सा कर्मी उनकी चिकित्सा करते हैं, इस कारण उन्हें भी निशाना बनाया जाता है और धमकियां दी जाती है। फिर भी अपनी जान की परवाह किये बिना मानवतावादी कार्यकर्ता अपने मिशन पर लगे रहते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दिन ब दिन बढ़ते हुये आतंक और हिंसा के वैश्विक खतरों के बीच मानवीय कर्मियों का काम काफी अहम है। सीरिया से लेकर दक्षिण सूडान और मालदीव से लेकर अफ्रीका के भूखमरी वाले इलाकों तक मानवता कर्मियों का काम काफी जोखिम भरा है। आतंक और हिंसा के बीच विश्व भरके संकट से घिरे लोगों के लिए भोजन,पानी,दवा आदि का प्रबंध करना और उनलोगों तक पहुंचाना काफी कठिन और जोखिम भरा काम है। मानवता वादी मिशन दया, सहानुभूति, निष्पक्षता, तटस्थता और स्वतंत्रता सहित कई संस्थापक सिद्धांतों पर आधारित है। मानवतावादी सहायता कर्मियों की विशेषता इस बात से समझा जा सकता है कि वे आपदा प्रभावित समूहों को राष्ट्रीयता, सामाजिक समूह,धर्म, लिंग,जाति या किसी अन्य आधार पर भेदभाव किये बिना जीवन बचाने में सहायता करने के साथ-साथ उनके दीर्घकालिक पुनर्वास का प्रयास करते हैं। मानवतावादी दिवस ऐसे कर्मियों को सम्मानित करने का हमे संदेश तो देता ही है, हमरा भी कर्तव्य बनता है कि हम आगे बढ़कर ऐसे कर्मवीरों को सम्मानित कर अपना फ़र्ज़ अदा करें। तभी सच्चे अर्थों में मानवतावादी दिवस मनाने का उद्देश्य पूरा होगा।
जे.पी.श्रीवास्तव,
ब्यूरो चीफ, बिहार।




