बिहार:—-
पटना:जबसे रालोसपा पार्टी का विलय जेडीयू में हुआ है तभी से कुछ वैसे नेता जो जदयू में कुशवाहा समाज का प्रतिनिधित्व करने और उस समाज का बड़ा नेता बनने का ख्वाब पाल रहे थे उन्हें बड़ी कठिनाई होती दिख रही है। ऐसे लोग नहीं चाहते हैं कि उपेंद्र कुशवाहा का जदयू में कद बढ़े। इसको लेकर जदयू में उपेंद्र कुशवाहा के पांच खिंचाई का अंदरूनी प्रयास बड़े जोर-शोर से चल रहा है।
उपेन्द्र कुशवाहा की पहचान एक जुझारू नेता के रुप में तो है ही, कुशवाहा समाज में उनकी पहचान और कुशवाहा नेताओं से बढ़-चढ़कर है। ऐसे में पहले से जो नेता जदयू में कुशवाहा समाज के नेता के रूप में उभरकर सामने आ रहे थे, उन्हें अपनी पहचान बनाये रखने का संकट सामने आता दिखाई दे रहा है। उन्हें अपनी उपेक्षा का डर भी अंदर-अंदर समाया हुआ है। ऐसे में उनलोगों के द्वारा उपेन्द्र कुशवाहा का अंदरखाने विरोध किया जा रहा है।
बताया जाता है कि जिस समय उपेन्द्र कुशवाहा अपनी पार्टी का विलय जदयू में करने का प्रस्ताव लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात करने की बात जाहिर किये थे उस समय से ही कुछ लोग नहीं चाहते थे कि उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी का विलय जदयू में हो। उनकी पार्टी के विलय का अंदरखाने प्रबल विरोध हो रहा था। परन्तु मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तमाम आंतरिक विरोध को दरकिनार करते हुए न केवल उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी को जदयू में विलय को स्वीकार कर लिया बल्कि उन्हें जदयू पार्लियामेंट्री बोर्ड के अध्यक्ष का बहत बड़ा पद देकर उनका कद बहुत बढ़ा दिया। ऐसे में जदयू में पहले से चले आ रहे कुशवाहा समाज के नेताओं को जलन तो होना ही था।
जानकारों का कहना है कि जदयू का एक बड़ा धड़ नहीं चाहता है कि पार्टी में उपेन्द्र कुशवाहा की स्थिति मजबूत हो। लिहाजा आरसीपी सिंह का गुट उपेन्द्र कुशवाहा का भारी विरोध कर रहा है। बताते हैं कि आरसीपी सिंह के स्वागत के लिए जेडीयू दफ्तर में लगाये गये पोस्टर से उपेन्द्र कुशवाहा का फोटो नहीं लगाना उसी कुशवाहा पाॅलिटिक्स का नतीजा है। जानकार बताते हैं कि उपेंद्र कुशवाहा की पहचान कुशवाहा समाज के एक बड़े नेता के रुप में है। वैसे उपेन्द्र कुशवाहा पहले भी नीतीश कुमार के बड़े करीबी रह चुके हैं। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी भी संभाल चुके हैं। राज्य सभा और लोकसभा के सांसद के साथ केन्द्रीय मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री का पद भी संभाल चुके हैं।
जहां तक राजनीतिक दल का सवाल है तो उपेन्द्र कुशवाहा कई दलों में रहने के बाद अंत में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का गठन कर अपनी राजनीति करने लगे। जाहिर सी बात है कि उनका पोलिटिकल प्रोफाइल बहुत ऊंचा है। ऐसे में उनसे जलन होना स्वाभाविक सी बात है। उनके इस प्रोफाइल को देखकर अन्य कुशवाहा नेता काफी सहमें हुये रह रहे हैं। बताते हैं कि लव-कुश समीकरण को मजबूत करने के लिए 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद जदयू प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेवारी पूर्व विधायक उमेश कुशवाहा को दी गई। उस समय तक उपेन्द्र कुशवाहा जेडीयू में शामिल नहीं हुये थे। इनके शामिल होने के बाद से उमेश कुशवाहा की पूछ कुशवाहा समाज में कम हो गई है। बल्कि कई अन्य नेता भी इस इंट्री से खुश नहीं हैं।
आरसीपी सिंह से उमेश कुशवाहा की काफी नजदीकी है। इसी का नतीजा था कि आरसीपी सिंह के केन्द्र में मंत्री बनने के बाद उमेश कुशवाहा का बयान आया था कि जदयू में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए कोई वैकेंसी नहीं है। अगले तीन सालों तक आरसीपी सिंह केन्द्रीय मंत्री के साथ साथ जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने रहेंगे। दरअसल उस समय यह चर्चा बड़े जोरों से चल रही थी कि उपेंद्र कुशवाहा जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जा सकते हैं। इसी चर्चा के मद्देनजर उमेश कुशवाहा ने नो वैकेंसी वाला बयान दिया था।
बताते चलें कि दोनों नेता एक ही विधानसभा क्षेत्र वैशाली के जंदाहा से आते हैं जो अब महनार विधानसभा के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि प्रारंभ से ही दोनों एक दूसरे के कट्टर विरोधी रहे हैं। समानता यह है कि दोनों एक-एक बार विधायक रह चुके हैं। यह भी कहा जा रहा है कि उपेन्द्र कुशवाहा को उमेश कुशवाहा के कारण ही जंदाहा विधानसभा छोड़ना पड़ा था। 2005 के विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा जंदाहा विधानसभा क्षेत्र से जहां जदयू के टिकट पर चुनाव लड़े वहीं उमेश कुशवाहा उसी क्षेत्र से आरजेडी के टिकट पर चुनाव लड़े। लेकिन विडंबना यह रही कि दोनों चुनाव हार गये।
अब देखना है कि कुशवाहा नेताओं के विरोध के वाबजूद उपेन्द्र कुशवाहा जदयू में अपनी पकड़ कहां तक मजबूत कर पाते हैं।
जे.पी.श्रीवास्तव,
ब्यूरो चीफ, बिहार।




