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रक्सौल में जमीन रजिस्ट्री में बड़े घोटाले का हुआ पर्दाफाश

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बिहार——-

अरुण कुमार गिरी, मुख्य संपादक।

मोतिहारी: भ्रष्टाचार पर अंकुश की बात जीतनी भी कर ली जाए,चाहे जितने भी कानून बना लिये जाएं, लेकिन भ्रष्टाचारियों पर इसका कोई असर पड़नेवाला नहीं है। लगभग सभी भ्रष्टाचारियों का कोई-न-कोई आका, सरपरस्त बनकर ऊंचे ओहदे पर सरकार में कहीं न कहीं बैठा हुआ है। हां यह बात सच है कि कुछेक भ्रष्टाचरी जिनकी पहुंच उन आकाओं तक नहीं है वे निगरानी विभाग के चपेटे में आ जाते हैं और निगरानी विभाग ऐसे मामलों को अपनी उपलब्धियों में गिनाकर अपना पीठ थपथपा लेती है। मगर सच्चाई यही है कि भ्रष्टाचार में लिप्त बड़े-बड़े अधिकारी/कर्मचारी, सर पर आकाओं का वरदहस्त होने के कारण अपनी अवैध कमाई का ढेर लगाते चले जाते हैं।
बिहार में सरकारी कर्मचारी आचार नियमावली लागू है। नियम है कि कोइ भी सकारी कर्मचारी अपने,अपनी पत्नी, पुत्र पुत्री, माता-पिता एवं अन्य आश्रीतों के नाम से किसी प्रकार का चल-अचल संपत्ति खरीदता है या बेंचता है तो उसे सरकार से पूर्वानुमति लेनी होगी। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो उसके विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई की जाएगी। अब नये परिपत्र के मुताबिक उनपर आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जा सकता है।
यहां बात चल रही है बिहार सरकार के पदाधिकारियों/कर्मचारियों की। इसलिए अन्य राज्यों की चर्चा यहां नहीं की जा रही है। बिहार में 38 जिला है। सभी जिला मुख्यालयों में कतिपय पदाधिकारियों/कर्मचारियों का आलीशान मकान बना हुआ है।सरकार द्वारा अपने एजेंसियों से इसकी जांच कराई जानी चाहिए कि उक्त संपत्ति उसने कैसे हासिल की है।
राजधानी पटना में लगभग सभी अधिकारियों/कर्मचारियों का फ्लैट्स/मकान/भवन बना हुआ है जो नामी और बेनामी, उन्हीं अधिकारियों/कर्मचारियों की संपत्ति होगी। इसकी जांच हो तो बहुत से लोग इसकी जद में आ जायेंगे।
इसी क्रम में पूर्वी चम्पारण जिला के रक्सौल शहर के जमीन की रजिस्ट्री में एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। कहते हैं कि रक्सौल नगर परिषद द्वारा बूचड़खाना के लिए जमीन खरीदने के नाम पर एकरारनामा के आधार पर कुल 5 करोड़ 97 लाख रुपए का भुगतान संबंधित पक्षकारों को कर दिया गया। रक्सौल शहर के कतिपय व्यक्तियों द्वारा इस घोटाले के विरुद्ध एक आवेदन जिलाधिकारी, पूर्वी चम्पारण को दिया गया। तब जाकर इस मामले की जानकारी जिला प्रशासन को हुई।
यह मामला 5 अक्टूबर 2020 का है जिस दिन रक्सौल निबंधन कार्यालय में दो एकरारनामा दस्तावेज बना। एक दस्तावेज 3.23 डीसमील जमीन का जिसका मूल्य 1 करोड़ 13 लाख 5 हजार रुपया दर्शाया गया और उसी दिन दूसरा दस्तावेज 32.28 डीसमील जमीन का बना जिसका मूल्य 12 करोड़ 75 लाख 12 हजार दर्शाया गया।
रक्सौल के खुरैया टोला में खाता संख्या 107,24 और 52 खेसरा संख्या 1622 और 1627 का 32.28 डीसमील जमीन बूचड़खाना के लिए खरीदना था। लेकिन रजिस्ट्री आफिस रक्सौल के अवर निबंधक, कार्यपालक पदाधिकारी,नगर परिषद रक्सौल, मुख्य पार्षद रक्सौल, सशक्त स्थाई समिति रक्सौल के मिलीभगत से दस्तावेज को निबंधित नहीं कराकर एकरारनामा के आधार पर कुल 8 करोड़ 55 लाख 59 हजार 440 रपये मेंसे 5 करोड़ 97 लाख रुपये का भुगतान जमीन मालिक को नगर परिषद रक्सौल द्वारा कर दिया गया।
शेष राशि का भुगतान करने के पहले ही इस बड़े घोटाले की जानकारी रक्सौल नगर परिषद के कुछ वार्ड पार्षदों को हो गई, उनलोगों ने वार्ड नंबर 10 के वार्ड पार्षद रवि कुमार गुप्ता के नेतृत्व में एक आवेदन डीएम पूर्वी चम्पारण को देते हुए इस महाघोटाले को उजागर किया और कार्रवाई का अनुरोध किया। डीएम ने इसकी जांच अपर समाहर्ता सह लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी अनिल कुमार, तत्कालीन अपर समाहर्ता सह जिला लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी आर.एन.चौधरी तथा डीसीएलआर रक्सौल को सौंपते हुए जांच रिपोर्ट शीघ्र देने का निर्देश दिया।
जांच पदाधिकारियों द्वारा भूमि का स्थल निरीक्षण किया गया और सभी विन्दुओं पर गहराई से जांच की गई। जांच के क्रम में यह भी पाया गया कि भूमि की श्रेणी में भी अवर निबंधक और कार्यपालक पदाधिकारी के मेल से हेराफेरी की गई है। कम मूल्य के जमीन को अधिक मूल्य दिखाकर एकरारनामा किया गया है। जांच में उपरोक्त सभी को इस मामले में दोषी पाया गया।इसके अलावे इस बात के लिए भी रक्सौल नगर परिषद के मुख्य पार्षद, कार्यपालक पदाधिकारी, सशक्त स्थाई समिति को दोषी पाया गया कि बिना विभागीय अनुमति जमीन खरीदी गई।
इस मामले को लेकर तत्कालीन अवर निबंधक मनीष कुमार को निलंबित करने के साथ-साथ कार्यपालक पदाधिकारी रक्सौल, सशक्त स्थाई समिति और मुख्य पार्षद के विरुद्ध कार्रवाई के लिए विभाग को डीएम ने पत्र भेजा है। तत्काल बूचड़खाना के जमीन बिक्री पर रोक लगा दी गई है। मुख्य पार्षद को हटाने की कार्रवाई की गई है।
यहां यह ज्वलंत प्रश्न उठता है कि क्या ऐसे मामले में निलम्बन की अनुशंसा ही काफी है,या ऐसे पदाधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराना, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जाना अनिवार्य नहीं है। निर्णय सरकार को लेना है।
इस मामले में केवल अवर निबंधक को दोषी ठहराना और अन्य लोगों को छोड़ देना न्यायसंगत नहीं जान पड़ता है। निबंधन विभाग प्रत्येक प्रमंडल में एक सहायक निबंधन महानिरीक्षक को पदस्थापित किया है जिनका मुख्य कार्य प्रमंडल के क्षेत्राधिकार में पड़नेवाले सभी निबंधन कार्यालयों का साल में दो बार निरीक्षण करना है ताकि निबंधन कार्यालय के गड़बड़ियों को उजागर किया जा सके। इतना ही नहीं प्रत्येक जिला के जिला अवर निबंधक को भी साल में एकबार उनके अधीन के अवर निबंधन कार्यालयों का निरीक्षण करना है ताकि कोई गड़बड़ी हो तो पकड़ में आये। इतना ही नहीं विभाग ने लगभग प्रत्येक जिला में एक कार्यालय अधीक्षक को भी पदस्थापित किया है जिनका मुख्य कार्य कार्यालय कार्य का निरीक्षण है। उन्हें भी जिले के निबंधन कार्यालयों का निरीक्षण कर प्रतिवेदन देना है। ऐसी स्थिति में यह जानना आवश्यक है कि उक्त पदाधिकारियों ने वर्ष 2020,2021में रक्सौल निबंधन कार्यालय का निरीक्षण किया है या नहीं। यदि किया है तो इतनी बड़ी गड़बड़ी का रिपोर्ट क्यों नहीं किया। यदि निरीक्षण नहीं किया गया है तो कर्त्तव्य में लापरवाही के लिए विभाग उनके उपर क्या कार्रवाई की है यह जानना अत्यंत आवश्यक है।