Fast Track Courts: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने देशभर में रेप और बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों की जल्दी सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों (FTSCs) की संख्या बढ़ाकर 850 करने की मंजूरी दी है। इसके साथ ही इस योजना को अगले पांच साल यानी वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक जारी रखने का फैसला किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे मामलों की सुनवाई जल्द पूरी करना और पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाना है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट के फैसलों की जानकारी देते हुए कहा कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकना और पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाना सरकार की प्राथमिकता है।
फास्ट ट्रैक अदालतों के लिए ₹3,788 करोड़ का बजट मंजूर
कैबिनेट ने इस योजना को अगले पांच साल तक चलाने के लिए कुल ₹3,788.04 करोड़ का बजट मंजूर किया है। इसमें केंद्र सरकार ₹2,353.15 करोड़ खर्च करेगी, जबकि ₹1,434.89 करोड़ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से दिए जाएंगे। केंद्र सरकार अपने हिस्से की रकम निर्भया फंड से देगी। इस फंड का इस्तेमाल महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है।
देश में 850 होंगी फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें
फिलहाल देश में 779 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें काम कर रही हैं। इनमें 399 विशेष पॉक्सो (POCSO) अदालतें भी शामिल हैं। अब सरकार ने इनकी संख्या बढ़ाकर 850 करने का फैसला किया है। नई अदालतें उन जिलों में शुरू की जाएंगी, जहां रेप और बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामले बड़ी संख्या में लंबित हैं। यह योजना देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू की जा रही है।
हर अदालत में नियुक्त होंगे न्यायिक अधिकारी और कर्मचारी
मामलों की सुनवाई में देरी न हो, इसके लिए हर फास्ट ट्रैक अदालत में अलग टीम तैनात की जाएगी। इसमें एक न्यायिक अधिकारी और मामलों की पैरवी करने के लिए एक विशेष सरकारी वकील होंगे। इसके अलावा, अदालत के कामकाज में मदद के लिए 6 सहायक कर्मचारियों की भी नियुक्ति की जाएगी। इससे मामलों की सुनवाई और जरूरी कानूनी काम तेजी से पूरे करने में मदद मिलेगी।
पीड़ितों और बच्चों के लिए सुरक्षित होगा अदालत का माहौल
इस योजना का उद्देश्य पीड़ितों को अदालत में सुनवाई के दौरान होने वाले मानसिक तनाव से बचाना भी है। इसके लिए ऐसे केंद्र बनाए जाएंगे, जहां पीड़ित और गवाह बिना किसी डर या दबाव के अपना बयान दर्ज करा सकेंगे। बच्चों के लिए खास कोर्ट रूम भी तैयार किए जाएंगे, ताकि उन्हें अदालत का माहौल डरावना न लगे और वे आसानी से अपनी बात रख सकें।
2019 में शुरू हुई थी योजना, अब तक 4 लाख से ज्यादा मामलों का निपटारा
फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों की शुरुआत 2 अक्टूबर 2019 को हुई थी। इन अदालतों को शुरू करने का उद्देश्य रेप और पॉक्सो से जुड़े मामलों की जल्द सुनवाई करना था। सुप्रीम कोर्ट ने भी उन जिलों में विशेष अदालतें बनाने के निर्देश दिए थे, जहां पॉक्सो के 100 से ज्यादा मामले लंबित थे। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन अदालतों ने अब तक 4,02,457 से ज्यादा मामलों का निपटारा किया है। वहीं, साल 2024 में इन अदालतों में 88,902 नए मामले दर्ज हुए और 85,595 मामलों की सुनवाई पूरी की गई।
ऑनलाइन डैशबोर्ड से रखी जाएगी अदालतों के कामकाज पर नजर
इस योजना पर सही तरीके से काम हो रहा है या नहीं, इसकी निगरानी के लिए ऑनलाइन FTSC डैशबोर्ड का इस्तेमाल किया जाएगा। कानून और न्याय मंत्रालय का न्याय विभाग राज्य सरकारों और हाई कोर्ट के साथ मिलकर अदालतों के कामकाज की समीक्षा करेगा। इस डैशबोर्ड के जरिए यह जानकारी मिल सकेगी कि कितने मामलों की सुनवाई पूरी हुई और कितने मामले अभी लंबित हैं।
सरकार के इस फैसले का मुख्य उद्देश्य रेप और बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में होने वाली देरी को कम करना है। अगले पांच साल तक फास्ट ट्रैक अदालतों की संख्या बढ़ने से ऐसे मामलों की सुनवाई को गति देने में मदद मिल सकती है। इससे पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाने और अदालतों में लंबित मामलों की संख्या कम करने की दिशा में काम किया जा सकेगा।






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